हरित और सामूहिक आतिशबाजी से मनाएं दीपावली

सुदर्शन सोलंकी

राम के वनवास से लौटने के उत्सव के साथ-साथ आजकल दीपावली प्रदूषण की मार से डराती भी है। नतीजे में कई राज्य सरकारें आतिशबाजी पर कडाई से रोक लगा देती हैं। सवाल है, कैसे बचा जा सकता है, पटाखों के प्रदूषण से?

दीपावली के दौरान प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि दीपावली के बाद वायु-प्रदूषण बढ़ता है, क्योंकि पटाखे हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक तत्वों को बढ़ा देते हैं। इनमें कई तरह के जहरीले रसायन होते हैं जो पर्यावरण के साथ ही हमारी सेहत को भी नुकसान पहुंचाते हैं।

पटाखों में मुख्य रूप से सल्फर के तत्व मौजूद होते हैं। इनमें परक्लोरेट का उपयोग एक विस्फोटक की तरह किया जाता है जो कैंसर-कारक हो सकता है। हालांकि भारत में पटाखों के निर्माण में परक्लोरेट प्रतिबंधित है, किन्तु अन्य देश से बुलाए गए पटाखों में यह हो सकता है। भारत में पटाखों के निर्माण में बेरियम का उपयोग किया जाता है जो हृदय सम्बन्धी रोग उत्पन्न कर सकता है।

पिछले साल, 2021 में दीपावली के अगले दिन दिल्ली का ‘एयर क्वालिटी इंडेक्स’ (एक्यूआई) 462 था। इसका मतलब है कि दिल्ली में हवा ‘गंभीर से ज्यादा’ खतरनाक स्तर पर थी। ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ेस’ नामक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1990 से लेकर अब तक चीन में पीएम-2.5 (पार्टीकुलेट मैटर जो हवा में मौजूद बारीक कणों से बनता है) के कारण असमय मौतों में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत में यह आंकड़ा तीन गुना अधिक है।

पटाखों की शुरुआत चीन में करीब 2200 साल पहले हुई थी। तब वहां बांस की छड़ी को आग में डाला जाता था जिससे गांठ फटने के कारण तेज आवाज आती थी। बाद में 9वीं सदी में चीनियों ने बांस में बारूद भरकर फटाखे बनाना शुरू किया। बाद में बांस की जगह कागज का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया गया। उनकी मान्यता थी कि पटाखों के शोर से डरकर बुरी आत्माएं एवं दुर्भाग्य भाग जाएंगे।

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13वीं से 15वीं शताब्दी में पटाखे चीन, यूरोप व अरब देशों तक आतिशबाजी में इस्तेमाल किए जाने लगे। ‘द हिस्ट्री ऑफ फायर वर्क्स इन इंडिया, एडी 1400 से 1900’ में लिखा है कि सन् 1518 में गुजरात में एक शादी में पटाखों से आतिशबाजी की गई थी। दुनिया में सर्वाधिक पटाखों का उत्पादन चीन में ही होता है, इसके बाद भारत दूसरे नंबर पर है। भारत में पटाखों के उत्पादन से करीब 10 लाख लोगों को रोजगार मिलता है।

प्रदूषण की बढ़ती समस्या के कारण दिल्ली सरकार ने इस दीपावली पर भी पटाखों के उत्पादन, बिक्री और आतिशबाजी पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा रखा है। कुछ राज्य दीपावली पर पटाखों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा देते हैं तो कुछ राज्य केवल निर्धारित समय में ही हरित पटाखे जलाने की अनुमति देते हैं। अधिकांश यूरोपीय देश, सिंगापुर, इंग्लेंड, वियतनाम, आइसलैंड इत्यादि देश त्यौहारों के समय ही पटाखे खरीदने की अनुमति देते हैं। अमेरिका के कई प्रांतों में व्यक्तिगत स्तर पर पटाखे चलाने की अनुमति नहीं होती, बल्कि वहां सामाजिक, शहर, राज्य स्तर पर पटाखे चलाने की अनुमति मिलती है। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में भी आकाश में जाकर फूटने वाले और तेज़ आवाज़ करने वाले पटाखों पर प्रतिबंध लगा है, जबकि न्यूज़ीलैंड में साल में सिर्फ चार बार ही पटाखे चलाने की अनुमति है।

हमारे देश में भी प्रदूषण की समस्या को देखते हुए केवल विशेष अवसर, जैसे – दशहरा, दीपावली और क्रिसमस जैसे बड़े धार्मिक उत्सवों पर ही केवल हरित पटाखों को सामाजिक या सामूहिक तौर पर, निर्धारित समय अवधि में, निर्धारित संख्या में ही चलाने की अनुमति होनी चाहिए। ऐसा करने से पटाखा उद्योग के कामगारों का रोजगार भी बना रहेगा, साथ ही हम हमारे त्यौहारों को पूरे रीति-रिवाजों के साथ मना पाएंगे। इस तरह से प्रदूषण की समस्या से भी बचा जा सकेगा। इन उपायों को अपनाने के लिए सरकार या कोर्ट द्वारा लगाए जाने वाले प्रतिबंध की बजाए हम सभी स्वयं ही व्यक्तिगत स्तर पर इसे पहले से ही अपनाएं तो यह और भी ज्यादा बेहतर होगा।(सप्रेस)

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