‘कश्मीर फाईल्स’ और भारतीय सिनेमा

मीनाक्षी नटराजन

भरपूर मुनाफे के साथ-साथ देशभर में बवाल काट रही फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ ने हमारे सिनेमा को भी एक खास मुकाम तक पहुंचा दिया है। कल तक, जहां इस तरह की लगभग हरेक फिल्म में, भले ही कहने भर को, किसी एक जाति और धर्म को कटघरे में खडा नहीं किया जाता था, वहीं ‘कश्मीर फाइल्स’ में खुलकर मुसलमानों को अपराधी करार दिया गया है। क्या और क्यों है, यह बदलाव?

साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है। भारतीय सिनेमा भी अपने शास्त्रीय युग में साहित्य के समकक्ष रहा है। ऐसी कई फिल्में हैं, जिन्हें देखते समय श्रेष्ठ साहित्य वाचन सा आनंद प्राप्त होता है। हाल ही में ‘कश्मीर फाईल्स’ रिलीज हुई जिस पर प्रधानमंत्री जी की मुहर भी लग गई। फिल्म रिलीज के बाद परस्पर विरोधाभासी प्रतिक्रिया सामने आईं। प्रश्न कश्मीर से विस्थापित हुए पंडितों के द्वारा झेली गई त्रासदी, उस वक्त की परिस्थिति, राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर उठाये गये। पीड़ितों की संख्या और फिल्म में जो घटनाएं दिखाई गईं उनकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर सवाल उठे।

सच तो यह है कि मानवीय पीड़ा का एहसास किसी एक के द्वारा भी किया गया हो, तो वो तहजीबी विरासत पर लगा बदनुमा दाग ही है, लेकिन किसी घटना को विरुपित करके प्रस्तुत करना भी उतनी ही बड़ी तहजीबी त्रासदी है। खासकर तब, जबकि इरादे में ईमानदारी न हो। इस फिल्म के पक्षधर भले ही यह न कह रहे हों, मगर उनका अव्यक्त भाव लोकमानस समझ रहा है। यह संप्रेषित हो रहा है कि जवाबी हिंसा जायज है, बहुसंख्या खतरे में है। उसके समक्ष रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार से ज्यादा बुलंद सवाल अपने को बचाने का है। पिछले दिनों की गई पत्थरबाजी पर किसी बहुसंख्यक को शर्मिन्दा होने की जरुरत नहीं है।

सवाल यह भी है कि कश्मीरी विस्थापित पंडित न होकर बहुजन समाज के होते, तो क्या प्रभुत्व संपन्न शहरी अभिजात्य वर्ग की चेतना इतनी ही आहत होती? शायद नहीं। फरीदाबाद, ऊना, हाथरस आदि सैकड़ों-हजारों घटनाएं जब घटीं तो इस वर्ग ने दूसरी तरफ नजर फेरना उचित समझा। कोरोना लॉकडाउन में पैदल लौटते समूहों को, जिनमें अधिकांश बहुजन थे, आदतन अशिष्ट करार दिया गया। उसी के बाद मौलिक हक से पहले मौलिक कर्त्तव्य पालन की बहस छेड़ी गई। प्रभुत्व संपन्न वर्ग को बहुजन पर होते अत्याचार पर कन्नी काटते हुए देखते समय पूछने को जी चाहता है कि क्या बहुजन हिन्दू नहीं हैं? यदि नहीं हैं तो फिर धर्मांतरण का बवाल खड़ा क्यूं किया जाये?

प्रभुत्व संपन्नता यह मानती है कि उन पर अत्याचार का उनको वैसा नैसर्गिक हक है, जैसा मनुस्मृति में दर्ज है। कुछ साल पहले भिण्ड (मध्यप्रदेश) में जातिगत हिंसा में करीब छह दलित नौजवान प्रभुत्व संपन्न वर्ग की गोली का शिकार हुए थे। यदि तमाम ऐसी घटनाओं पर ‘बहुजन फाईल्स’ बने, तो उस पर क्या प्रतिक्रिया होगी? माननीय प्रधानमंत्री जी मुहर लगायेंगे? शायद उनके संगठन फिल्म निर्माता, कलाकारों को देशद्रोही घोषित कर देंगे। ‘कश्मीर फाईल्स’ पर प्रतिक्रिया स्वरुप जब राजस्थान के एक युवक ने दलित अत्याचार का प्रश्न उठाया, तो उस पर सभी दक्षिण पंथी सोशल मीडिया के जरिये टूट पड़े।

देश की आबादी में मात्र आठ फीसदी आदिवासी हैं, लेकिन वे 57 फीसदी विस्थापन झेलते हैं और तब प्रभुत्व संपन्नता उसे विकास के लिए जरुरी करार देती है। आदिवासी जब प्रतिरोध करते हैं; तो जाहिल, विकास विरोधी कहलाते हैं। इसका यह कतई मतलब नहीं कि कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, उन पर हुए अत्याचार कोई मानवीय त्रासदी नहीं है। किसी एक भी इंसान को विस्थापन और अत्याचार झेलना पडे़ तो वह मानवता मात्र पर लगा कलंक है।

बहरहाल, वही वर्ग जिन्हें बहुजनों के ‘मेन होल’ में घुटकर मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता, अक्सर उनका भरपूर इस्तेमाल सांप्रदायिक वातावरण निर्माण के लिए करते हैं। ‘तमस’ याद आता है, जिसमें सुअर को मारकर मस्जिद के आगे डालने का दृश्य दिखाया गया है। नायक बहुजन समाज का है और उसके हाथों अनजाने ही यह कर्म करवा लिया जाता है।

गौरतलब है कि इन सवालों से परे हिन्दी सिनेमा की थोडी पड़ताल की जाये तो कुछ तथ्य सामने आते हैं। समता और समाजवाद से बाजार का रास्ता कैसे तय किया गया, यह पता चलता है। बाजार के युग में साधन की शुचिता का कोई अर्थ नहीं है। फिल्म ‘मदर इंडिया’ में मां को बेटे की अराजकता कबूल नहीं थी। ‘दीवार’ में मां अनैतिक राह को पकड़ चुके बेटे के साथ नहीं रहती। यह उस बेटे को भी पता है। ‘वास्तव’ तक यह सिलसिला चलता रहा, मगर ‘कंपनी’ में मां को पता है कि बेटा अंडरवर्ल्ड से जुड़ा है। नैतिकता की रेखा दबे पांव पार हो गई। ‘गुरु’ में आज की सत्ता के सबसे करीबी पूंजीपति के सफर से मिलता-जुलता नायक गढ़ा गया है। वो नायक छाती ठोंककर गलत तरीकों को अपनाने की पुष्टि करता है और दर्शक ताली बजाते हैं।

‘पद्मावत’ पर भावनाएं आहत हो गईं, लेकिन ‘फूलनदेवी’ पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आती। आज शायद ‘अछूत कन्या’, ‘सुजाता’ जैसी दलित और प्रभुत्व संपन्न वर्ग के मिलाप की फिल्मों को फिल्माया नहीं जा सकेगा। इसमें भावनाएं आहत होने का खतरा है। लम्बे समय तक ‘गदर’ जैसी फिल्मों में पाकिस्तानी चरित्रों को ‘खल’ पात्र के बतौर ही पेश किया गया, जैसे कि ‘खलपन’ ही उनकी तहजीब हो। परिणामतः वहां के लोकमानस की भारत में कोई जानकारी ही नहीं है, जबकि वे बॉलीवुड फिल्में देखते हैं, हमारी तहजीब के कई आयामों को जानते भी हैं।

‘कश्मीर फाईल्स’ ने भी एक रेखा पार कर दी है। ‘उरी’ जैसी फिल्म तक में भी किसी एकाध चरित्र को ईमानदार मुस्लिम के तौर पर दिखाया जाता रहा है। जैसे कि मुस्लिम वर्ग में सौहार्द्रमयी, ईमानदारी कोई अपवाद हो। मगर ‘कश्मीर फाईल्स’ में एक भी ऐसा चरित्र नहीं है। हालांकि सचाई यह है कि अनेक कश्मीरी पंडित, पड़ौसी तकाजों के साथ आज भी उन्हीं के पड़ोस में रहते हैं। इस फिल्म को डाक्यूमेंन्ट्री के तौर पर पेश करने की कोशिश की गई है। ‘मंथन’ और ‘सुस्मन’ भी क्रमशः दुग्ध उत्पादक समाज और तेलंगाना के बुनकरों पर ऐसी ही पारिस्थितिक सत्य पर आधारित मिथकीय चरित्रों के साथ बनी फिल्म है। उसमें दर्शक पात्रों के जरिये सच तक पहुंचते हैं। दर्द से रुबरु होते हैं। फिल्म के अंत में करुणा का भाव है। ‘कश्मीर फाईल्स’ देखने के बाद नफरत का भाव लेकर दर्शक विदा होता है। ‘कश्मीर फाईल्स’ की प्रोफेसर ने ‘सुस्मन’ में ‘चिन्ना’ का किरदार निभाया है। कब नफरत का भाव नैसर्गिक अभिनय क्षमता पर हावी हो गया, पता नहीं।

‘कश्मीर फाईल्स’ के बाद अब फिल्मों में अपवाद स्वरुप भी नेकनीयत मुस्लिम को दिखाने की जहमत नहीं उठानी पड़ेगी। बिना किसी आत्मबोध के उन्हें गलत ठहराया जा सकेगा। तो क्या यह आज के समाज की सोच है? या ऐसा समाज बनाने के लिए वातावरण निर्माण किया जा रहा है? भारतीय जनमानस नफरत को अधिक समय तक नहीं झेलता। यह उसे साबित करना होगा। 1946 में भी ‘हम एक है’ जैसी फिल्म बनी थी, जिसमें एक ही घर में हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई साथ-साथ पलते-बढ़ते हैं, अपने-अपने मजहब का पालन करते हैं। उम्मीद है कि नफरत का संदेशा देती फिल्मों की यह धारा अपवाद साबित होगी। (सप्रेस)

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