नर्मदा आंदोलन के सारथी : आखरी दम तक अहिंसक सत्याग्रही रहे जामसिंग भाई

मेधा पाटकर

लंबे समय पर नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुडे धार जिले के वरिष्‍ठ साथी जामसिंह भाई का हाल ही में देहांत हो गया । जामसिंह भाई की जमीन नर्मदा बांध की डूब में आई। वे विस्‍थापितों के हक में लगातार संघर्षरत रहे। जामसिंह भाई के देहांत पर नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री एवं सामाजिक कार्यकर्त्‍ता मेधा पाटकर की श्रध्‍दांजलि ।

जामसिंग भाई चले गये! अब उन्हें तत्काल बुलाना, किसी रैली, धरना या अधिकारियों से संवाद करने के लिए, असंभव हो गया है| जामसिंग भाई का सत्याग्रह उनके शब्द-शब्द में झलकता था, वैसे ही उनकी उपस्थिति में| वर्षों से एक लकड़ी लेकर चलते जामसिंग भाई जब अपनी कहानी सुनाते थे, तब सामने वाले को मजबूर करते थे, सुनने के लिए! और उनके अनुभव वही ऐसे थे कि अन्याय की धार तेज तर्रार होकर सामने आती थी! एक प्रकार से वार करती थी| लेकिन अहिंसक सत्याग्रही रहे, जामसिंग भाई, आखरी दम तक!

2006 में हमारे साथ 21 दिन का उपवास दिल्ली में किया था, जामसिंग भाई ने! गिरफ्तार होकर दिल्ली एम्स में पुलिस बल के साथ पहुँचाया था, उन्हें भी, लेकिन उन्होंने नहीं माना दल बल को और मुंह में नहीं लिया, एक बूंद भी, दाना-पानी का! उसी वक्त नरेंद्र मोदी जी, गुजरात के मुख्यमंत्री, गुजरात की नुमाइंदगी साबित करने के इरादे से, मात्र 51 घंटे तक उपवास पर बैठे थे…, एयर कंडीशनर्स के साथ सजाये पंडाल में| एक मुख्यमंत्री को इस तरह झुकाने वाले साथी रहे जामसिंग भाई!

जामसिंग भाई मूलतः भाजपा के स्थानीय प्रचारक थे, हमारे गेंदिया भाई के साथ, बड़वानी जिले के नर्मदा किनारे के गांवों में| खुद अमलाली गाँव के, सरदार सरोवर से विस्थापित जामसिंग भाई, उनकी डूबी जमीन, डूबा घर, बेटों की पात्रता, रास्ते के लिए अर्जित की गयी खेती की भरपाई….. और आखिर पुनर्वास में दी गयी, 200 कि.मी. दूर की, आखिर तक कब्जा न मिली जमीन के लिए लड़ते ही रहे, आखिर वे लड़ते-लड़ते चले गये| आंदोलन पर पूरा भरोसा और विश्वास, हर संघर्ष और संवाद में साथ रहते जामसिंग भाई की जीवटता अभूतपूर्व थी! अपने साथ पत्नी रमी बाई को भी लेकर, डोमखेड़ी(महाराष्ट्र) से राजघाट (म.प्र.) तक और दिल्ली -धुले-मुंबई के आंदोलनकारी कार्यक्रमों में सहभागी रहे जामसिंग भाई आखिर तक न्याय नहीं पाये, यही आंदोलन की हासिली के बावजूद दुखद हकीकत रही!

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जामसिंग भाई की जमीन डूबी तो भी अमलाली के अन्य परिवारों के साथ गुजरात जाना उन्होंने मना कर दिया| आंदोलन के ही साथ रहे…. जब कि कई परिवार गुजरात में फसाये जाने से वापस आ गये! जामसिंग भाई अपने पानी से गिरे-घिरे घर में, नदी किनारे सालों तक डटे रहे| उनके एक-एक बेटे को पात्रता और अधिकार के लिए जूझते, सफलता जरूर पाये, लेकिन उन्हें सर्वोच्च अदालत में याचिकाकर्ता के नाते जब शिकायत निवारण प्राधिकरण ने आग्रह क्या, हठाग्रह के साथ, न्याय दिलाने के ही उद्देश्य से धार तहसील, धार जिले की जमीन जो अतिक्रमित थी, लेने के लिए अन्य 15 लोगों के साथ मजबूर किया, तब हुआ अन्याय न नर्मदा प्राधिकरण से न जिलाधिकारियों से (3 अधिकारी आकर चले गये, तो भी) नहीं शिकायत निवारण प्राधिकरण के न्यायाधीशों से दूर हो पाया! उनके जमीन पर कब्जा कर बैठे एक आदिवासी परिवार ने ही उन्हें जबरन दूर रखा| विकलांग हो चुके जामसिंग भाई और सभी वंचित रहे विस्थापितों को दसों बार बुलाकर, कभी सुनवाई तो कभी अनसुनी करते रहा शिकायत निवारण प्राधिकरण!

लेकिन नहीं जिलाधिकारी को मजबूर कर पाये, नहीं अपने आदेशों पर अमल कर पाये|

इस पूरी हकीकत पर क्रुध्द होकर, स्पष्टता के साथ न्याय मांगते रहे जामसिंग भाई, जिसमें हम सब साथ रहे लेकिन कहीं कम पड़े, हर कदम उठा कर भी! अभी-अभी शिकायत निवारण प्राधिकरण में मेरे साथ जाकर पूरी हकीकत सुनाकर लौटे जामसिंग भाई आखिर शहीद होकर चले गये| अपने बेटे, रामीबाई ही नहीं, हम पर भी बोझ डालकर!

उनकी शहादत को व्यर्थ न जाने देंगे, आखिर तक डटेंगे, लड़ेंगे उन्हीं की प्रेरणा ह्रदय में सम्हालकर| जामसिंग भाई, आप की आवाज कानों में गूंजती रहेगी, व्यवस्था को चुनौती देकर!

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