सीताराम बाबा : एक सदैव जलती मशाल !

मेधा पाटकर

तीन दशक से ज्यादा का ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ उन अनेक स्थानीय, अनजान कार्यकर्ताओं की अद्भुद जिजीविषा और संघर्ष के हौसले से अपनी सफल यात्रा कर सका है। इनमें से एक थे – कडमाल गांव के सीताराम बाबा। तीन सितम्बर को वे हमसे हमेशा के लिए विदा हो गए हैं।

सीताराम बाबा चले गये! अपनी लम्बी, गहरी विरासत छोड़कर! यह विरासत थी – आंदोलनजीवी की….. एक विनम्र पर कट्टरता के साथ इतिहास रचने वाले की! अपनी माँ से उन्होंने हासिल की कहानियों की, नर्मदा घाटी के निवासियों को माँ नर्मदा के साथ जोड़ने की! उपवास, जेल, सब कुछ भुगतकर हंसते, खेलते, खिलखिलाहट के साथ डटे रहने की….. आम लोगों के बीच, नर्मदा आंदोलन का आधारस्तंभ बनकर!

सीताराम भाई बुजुर्गियत लेकर ही आंदोलन में पधारे और पहले काका, फिर बाबा बनते गये, लेकिन उनकी जवानों-सी ऊर्जा अदम्य रही। उनका हंसते-हंसते कभी शासन को, तो कभी ग्रामवासियों को भी डांटने का हक और ताकत बरकरार रही। सीताराम बाबा की गहरी सोच उनकी कहानियों में, उनके मुहावरों में ही छुपी रहती थी और अचानक बरसती थी ! उसकी बूंदें माहौल को न केवल ठंडा करतीं, बल्कि सुननेवालों को तन-मन तक भिगोती और विचारों से नहलाती थी !

उन्हें ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के ‘मानव बचाव’ के साथ प्रकृति, धरती और नदी बचाओ की विचारधारा दिल-दिमाग में भरी हुई सपनों की मंजिल लगती थी। यह प्रकट होता था, उनके साथ हुई हमारी सबकी हल्की-फुल्की मुलाकातों में ! इर्द-गिर्द बदलते समाज के मूल्यों और विकास के झूठे प्रतीकों पर उनका मन सवाल खड़ा करता था। सीताराम बाबा का पहला योगदान शुरू हुआ, हमारे साथ 1990 में शुरू हुए ‘मणिबेली सत्याग्रह’ से!  वे एक-एक आती-जाती, सत्याग्रहियों की टुकड़ी का हिस्सा नहीं थे, वे ‘कायमी टीम’ के मजबूत सदस्य थे। चारों महीने, जलभराव के सामने जल-सत्याग्रही बनकर! कभी दाल-बाटी बनाने में तो कभी गांववासी आदिवासियों से, पहाड़ और निमाड़ का रिश्ता बांधने में!

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मणिबेली के द्वार पर जब सैंकड़ों पुलिसवाले आकर शूलपाणेश्वर मंदिर में डट गए और हमने छोटी-सी सत्याग्रहियों की कुटिया डूब आने की आहट को चुनौती देते खड़ी की थी……तो गांववासियों और युवाओं के साथ पैदल चलकर पहुंचे सीताराम बाबा को भी पुलिस द्वारा पीटा गया था!

जब अहिंसक तरीके से अपने जल, जंगल, जमीन बचाने के लिये पहाड़ के ऊपर मानव-श्रंखला बनाकर डोमखेडी, निमगव्हाण, भरड़ और सुरुंग गांव के आदिवासी सर्वेक्षण का विरोध दर्ज कर रहे थे, तब शासन ने रेहमल वसावे की हत्या की थी! उसके शव को उठाकर जिलाधिकारी के सामने रखकर सर्वेक्षण रोका गया और उस एकमात्र शहादत पर भी धुले के हमारे अनगिनत समर्थकों ने हमारी निषेध रैली में हिस्सा लिया तो हम पर लाठियां बरसीं थीं….सबसे अधिक सीताराम भाई पर! बाद में हम सब जेल में बंद रहे!

सरदार सरोवर बांध की ‘विश्व बैंक’ की ‘मोर्स कमेटी’ द्वारा पोलखोल हुई थी। कमेटी के सदस्यों को निमाड़ के गांवों में, पहाडी ‘मुखडी’ जैसे गांव में, मणिबेली में महुआ के नीचे बिठाकर बातें सुनाने में ‘विश्व बैंक’ के मिशन के सामने भी सवाल करते, जेल भुगतने वालों में सीताराम भाई हरदम आगे रहते ही थे! वे अपने शब्दों में, अपनी भाषा और माध्यम में आंदोलन को गूंथते थे।

सीताराम भाई के पास घाटी में आए कोई पत्रकार, मिलने वाले, अतिथि-समर्थक पहुंचे नहीं – ऐसा संभव ही नहीं था। हर अतिथि को घर के बुजुर्गों का परिचय देने वाले परिवारजन थे, हमारे सभी युवा कार्यकर्ता! उन्हें भी सीताराम बाबा से मिलकर हकीकत ही नहीं, शासकों की करतूतों पर तीखी टिप्पणियों से काफी कुछ सीखने मिलता था। लम्बे-चौड़े भाषण न देने वाले, मंच पर भी अधिकांश समय आना न चाहने वाले सीताराम भाई का, भाईयों, बेटा-बेटी-पोते सभी के साथ आंदोलन से जुडा रहा परिवार जिसकी जीवटता और संघर्षशीलता उनकी मां की देन थी – जिसे सीताराम भाई ने आगे बढ़ाया। माँ के अंतिम दिनों में भी उनसे अर्थ-सारगर्भित कहानियाँ सुनने और अपने तरीके से बताने वाले सीताराम बाबा….. 

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भोपाल या दिल्ली में जब शासन के अधिकारी, मंत्री या मुख्यमंत्री से चर्चा में वे धीरे से पूछ लेते, क्या मैं कुछ बोलू? तो हमें रोकने की हिम्मत क्या, इच्छा भी नहीं होती! हमें पता चलता कि वे मुद्दे पर ही कहानी या मुहावरा सुनाएंगे और उससे ‘सौ सुनार की, एक लुहार की’ का परिचय देंगे। हर चर्चा के इस अनुभव को संवेदनशील अधिकारी भी अनौपचारिक चर्चाओं में याद किया करते थे,!

सीताराम भाई छोटे से बड़े तक हर कार्यक्रम में रहते…अपनी उम्र को भूलकर बांध की 80 मीटर ऊंचाई घोषित होने पर भोपाल में चला 26 दिन का उपवास भी अपने कंधों पर लेकर, कमलू जीजी, केवलसिंग, हमारे साथ बैठे तब सब चकित हुए थे! उन्होंने आखिर तक एक भी मौका नहीं छोड़ा, हमारे साथ खड़े रहने का! परिवारजन उन्हें रोकते तो वे उनके आदेश तोडताड़कर आखिर पहुँच ही जाते!

बाबा आमटे नर्मदा किनारे दशकभर रहे, तब उनके साथ नजदीकी रिश्ता और संवाद रखने वालों में से थे, सीताराम बाबा! उन्होंने मुआवजे के पैसे को तब तक नहीं छुआ, जब तक सर्वोच्च अदालत ने ही आदेश नहीं दिया। उनकी ही जमीन, जो पहले पानी के घेरे में आकर भी, छोडी गयी थी, आखिर विकल्प में 60 लाख पा गयी…उससे नया घर बनाकर सीताराम भाई उसमें रहकर भी धरातल से, अपने विचार से ही जुड़े रहे। उन्हें आखिर तक आस रही खेती बचाने की !

मध्‍यप्रदेश के राजघाट का सत्याग्रह, बरसात में ‘चातुर्मास’ जैसा होता था, तब याने 2015 के बाद भी, वहाँ सीताराम भाई मेरे साथी बने रहते थे! एक दिन भोर सुबह सत्याग्रही प्रातः कर्म के लिए गये और सीताराम भाई का दिल धड़कने लगा…. तो कैसे वैसे व्यवस्था करके उन्हें बडवानी अस्पताल में और डॉक्टरों के निर्णय पर उन्हें इंदौर के अस्पताल ले गये! वहां बेटे को वे बार-बार कहते रहे- मुझ पर कोई खर्चा न कर! मै यहाँ रह नहीं सकता। मैं ठीक हूँ और रहूँगा। उन्होंने दो-चार दिनों में ही अपनी नलियाँ तोड़ताड़कर खुद को मुक्त किया और बेटे को मजबूर किया, घर लौटा लाने को !  उसके बाद 3-4 साल निकाले… कभी-कभार डॉक्टर को देखते, दवाइयाँ लेते, लेकिन अपनी आंतरिक प्रेरणा के साथ जीते! 

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आंदोलन के शुरुआती दौर से आखिर तक जुड़े रहे सीताराम बाबा ने हमारे कार्यालय के लिए दान दी गयी जमीन की हकदारी भी ईमानदारी से सम्हाली और आंदोलन की विरासत भी। नर्मदा किनारे घाट निर्माण में कई दिनों तक डेरा डाल बैठते थे! आखिरी कार्यक्रम में एक नए अस्पताल के भूमि-पूजन कार्यक्रम में शामिल होकर मानो आंदोलन हर चुनौती से, नवनिर्माण की ओर बढ़ने की प्रेरणा की एक मशाल जलती छोड़कर ही वे चले गये…..। (सप्रेस) 

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