स्वास्थ्य विषमताओं को दूर करने व प्राथमिक स्वास्थ्य पर अधिक निवेश किये जाने की जरूरत

आक्सफैम इंडिया की विषमता रिपोर्ट 2021

हाल ही में जारी हुई आक्सफैम इंडिया की विषमता रिपोर्ट 2021 से खुलासा हुआ है कि सार्वजानिक स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में भारत में बढ़ती सामाजिक-आर्थिक विषमता वंचित समुदायों के स्वास्थ्य परिणामों को विकृत कर रही है।  ‘इंडियाज अनईक्वल हैल्थ स्टोरी’ रेखांकित करती है कि अनुसूचित जाति के बच्चों में कमजोर बच्चों का प्रतिशत सामान्य वर्ग के ऐसे बच्चों की तुलना में 12.6 अधिक है। बचपन के शुरुआती 5 वर्ष में जीवन की संभावना, आबादी के निम्नतम 20% तबके के बच्चों में आबादी के उच्चतम 20% तबकों के बच्चों से तीन गुना कम है।  मुस्लिम समुदाय आंगनवाड़ी कार्यक्रम से पोषण प्राप्‍त करने में पिछड़ रहे हैं और वे बच्चों के टीकाकरण में भी 8 प्रतिशत पिछड़े हैं।

ऑक्सफैम इंडिया रिपोर्ट बताती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को पिछले दशक में निरंतर आवश्यकता से कम वित्तीय संसाधन उपलब्ध हुए इस वजह से स्वास्‍थ्य का ढांचा और कमजोर हो गया। वर्ष 2010 में प्रति दस हजार जनसंख्या के लिए 9 अस्पताल बेड उपलब्ध थे, जबकि वर्ष 2020 में यह मात्र 5 रह गए। दरअसल, बेडों की उपलब्धता के मामले में 167 देशों की सूची में भारत 155वें स्थान पर है। दुनिया में युगांडा, सेनेगल, अफ़ग़ानिस्तान, बुर्किना फासो, नेपाल और ग्वाटेमाला सहित सिर्फ़ 12 देश ही हैं जहाँ प्रति 10 हज़ार जनसंख्या पर भारत से भी कम बेड उपलब्ध हैं। यानी भारत से बदतर स्थिति दुनिया के इन 12 देशों में ही है और बाक़ी देशों में भारत से बेहतर स्थिति है।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियों व कमी का एक परिणाम कोविड-19 की दूसरी लहर की अत्यधिक क्षति के रूप में सामने आया। मई 2021 तक इसके आधे मामले ग्रामीण क्षेत्र में थे, जबकि उत्तर प्रदेश व राजस्थान जैसे राज्यों में इसके 75 प्रतिशत मामले ग्रामीण क्षेत्रों में थे। भारत के लोगों की अधिक क्षति पहुंचाने वाली कोविड-19 की दूसरी लहर ने सार्वजनिक स्वास्थ्य की कमजोरियों को रेखांकित किया। वर्ष 2017 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल आंकड़ों के अनुसार 10,189 लोगों के लिए मात्र एक सरकारी एलोपैथिक डाक्टर व 90,343 लोगों के लिए एक सरकारी चिकित्सालय है।

आक्सफैम इंडिया ने ऐसे 768 व्यक्तियों का सर्वेक्षण किया, जो कोविड-19 से प्रभावित थे या इससे प्रभावित होने के बाद अब ठीक हो चुके थे। इस सर्वेक्षण से पता चला कि देखा जाए कि सामान्य श्रेणी के लोगों में से 18.2 प्रतिशत को गैर-कोविड स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में कठिनाई हुई, जबकि अनुसूचित जातियों व जनजातियों में यह कठिनाई 50 प्रतिशत को झेलनी पड़ी।

ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहार ने कहा  “बहुत घातक दूसरी लहर के बाद भी सरकार द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य, विशेषकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं व स्वास्थ्य के अपर्याप्त ढांचे के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी को अभी तक दूर नहीं किया गया है। इस कमी को दूर करना जरूरी है। अन्यथा स्वास्थ्य आपदाओं से मौजूदा विषमताएं और बढ़ती रहेगी व इसका निर्धन व सीमांत लोगों पर और प्रतिकूल असर पड़ेगा। यदि स्वास्थ्य को संवैधानिक अधिकार घोषित कर दिया जाए तो इन समस्याओं को कम किया जा सकता है।”

बेहार ने आगे कहा “इस रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हुआ है कि स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध होने वाले सार्वजनिक धन का अधिक भाग प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च नहीं हो रहा है अपितु अन्य मदों पर अपेक्षाकृत अधिक खर्च हो रहा है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र का दखल तेजी से बढ़ रहा है व इसके साथ जाति, वर्ग, लिंग व क्षेत्रीय आधार पर स्वास्थ्य विषमताएं बढ़ रही हैं।”

पिछले कुछ दशकों में कुल मिलाकर स्वास्थ्य के संकेतकों में सुधार हुआ है पर इस प्रगति में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूहों के स्तर पर बहुत भिन्नता रही है। स्वास्थ्य व्यवस्था में प्रगति से जीवन प्रत्याशा बढ़ गई है, पर लिंग, जाति व आय के आधार पर प्रगति भिन्न है।

ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया है कि धनी वर्ग की औसतन आयु निर्धन की अपेक्षा साढ़े सात वर्ष अधिक है। सामान्य श्रेणी की एक महिला की तुलना एक दलित महिला से करें तो सामान्य श्रेणी में आयु 15 वर्ष अधिक है। आदिवासियों में शिशु मृत्यु दर 44.4 है जो कि सामान्य श्रेणी से 40 प्रतिशत अधिक है व राष्ट्रीय औसत से 10 प्रतिशत अधिक है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में इन मूल विषमताओं को दूर करने के लिए यह रिपोर्ट सर्वसुलभ स्वास्थ्य उपलब्धि (यूनिवर्सल हैल्थ कवरेज) की संस्तुति करती है जिसके लिए सक्षम सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र का सहयोग जरूरी है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, प्रतिवर्ष स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च के कारण छः करोड़ लोग गरीबी में धकेले जाते हैं।

ऑक्सफैम इंडिया में विषमता, स्वास्थ्य व शिक्षा की लीड एंजेला तनेजा ने कहा “सबके लिए स्वास्थ्य के लक्ष्य को ध्यान में रखकर आकलन करें तो देश की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था इस लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रही है। सबसे बेहतर उपलब्धिय स्वास्थ्य प्राप्त करने का लक्ष्य अभी बहुत दूर हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महामारी के दौरान अधिक आवंटन हो तो स्वास्थ्य परिणामों पर उसका सकारात्मक असर नजर आता है। जिन राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य पर अधिक खर्च किया, वहां कोविड-19 के अपेक्षाकृत कम कन्फर्म हुए मामले सामने आए। ऑक्सफैम इंडिया के विश्लेषण में सामने आया कि गोवा और ओडिशा जैसे राज्यों ने स्वास्थ्य पर अधिक खर्च किया वहां कोविड-19 से रिकवरी या ठीक होने की दर भी अपेक्षाकृत अधिक रही।

केन्द्रीय व राज्य सरकारों ने सभी के लिए स्वास्थ्य बीमा योजनाएं आरंभ की हैं ताकि जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च कम हो सके व सर्वसुलभ स्वास्थ्य उपलब्धि की ओर बढ़ा जा सके। पर इसके बावजूद देखा गया है कि जेब से होने वाले स्वास्थ्य खर्च की अधिकता के कारण उत्पन्न निर्धनता वर्ष 1999-2000 में 3.25 करोड़ के आंकड़े को पार करती हुई 2017 में 5.5 करोड़ तक पहुंच गई व वर्ष 2015-16 में सरकारी बीमा योजनाएं देश के एक-तिहाई से भी कम परिवारों तक सिमटी हुई थी। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि सर्वसुलभ स्वास्थ्य उपलब्धि (यूनिवर्यल हैल्थ कवरेज) की जरूरतों को इन सीमित बीमा स्कीमों से पूरा नहीं किया जा सकता है।

प्रकाश, आक्सफैम इंडिया, ने कहा कि कोरोना वायरस ने अलग अलग समुदायों पर अलग अलग असर डाला है। सीमांत समुदायों को परेशानियोे का सामना करना पडा है। यह रिर्पोट एक मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था की संस्तुति करती है।

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