वैज्ञानिक प्रयोगों और सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाते थे कालूराम शर्मा

इंदौर (सप्रेस) । प्रख्यात प्रकृति शोधक, विज्ञान लेखक व वनस्पति शास्त्री और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय कालूराम शर्मा का 10 अप्रैल की दोपहर को निधन हो गया। वे 59 वर्ष के थे। उन्‍होंने पिछले दिनों ही कोरोना वैक्‍सीन लगवाई थी। उसके बाद उन्‍हें बुखार आया। उन्‍हें खरगोन के सिविल अस्‍पताल में भर्ती करवाया गया था। वहाँ उनका कोविड टेस्‍ट किया गया था। लेकिन रिपोर्ट नहीं आई थी, लेकिन हालत बिगड़ने पर उन्‍हें आज सुबह खरगोन से एम्बुलेंस से इंदौर के अरबिन्दो अस्पताल ले जाया जा रहा था।

कालूराम शर्मा पिछले एक दशक से अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुडे थे। उत्‍तराखंड में काम की शुरूआत के बाद पिछले सात वर्षों से खरगोन में शिक्षा के काम से सम्‍बध्‍द थे। इसके पूर्व आप लंबे समय तक एकलव्‍य के साथ विज्ञान प्रसार के काम में संलग्‍न थे। सन् 1986 से 1992 तक मालवा निमाड़ की भूमि पर विज्ञान के प्रसार में जुटे रहे तथा प्रकृति केन्द्रित पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते थे। वे ज़मीनी स्तर पर वैज्ञानिक चेतना फैलाने का काम कर रहे थे और अपने अनुभवों पर आधारित किताबें लिख रहे थे। उनका न रहना वैज्ञानिक जागरूकता फैलाने के प्रयास की दिशा में गहरा आघात है।

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय, भोपाल के श्री दीपेंद्र बघेल ने कहा कि हमेशा ही उनसे बात होती रहती थी। जीवन में बड़ा शून्य आ गया है। वरिष्‍ठ शिक्षा विद प्रमोद दीक्षित ने श्रध्‍दासुमन व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि हृदय पीड़ा से भर गया। वे बहुत विनम्र, संवेदनशील व्यक्ति थे। जब भी बात होती तो स्कूली शिक्षा और बच्चों के सीखने पर जरूर कुछ महत्वपूर्ण बताते रहे हैं। विश्वास नहीं कर पा रहा कि अब वह नहीं रहे। नेशनल बुक ट्रस्‍ट के श्री पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि कालूराम जी से मेरे कई दशक के ताल्लुक रहे। वे बेहद संघर्ष में तपे कुंदन थे। कालूराम शर्मा का ऐसे चला जाना मेरे लिए, वैज्ञानिक सोच के लिए और शिक्षा में नवाचार के लिए बड़ा नुकसान है। वे चींटी, कीड़े मकोड़े से लेकर प्रकृति की छोटी – छोटी बातों का अवलोकन करते, बच्चों का कौतूहल जगाते, खेलते। वे गरीबी, अभाव और संघर्ष की आग में तपा खालिस कंचन थे ।

एकलव्‍य के साथी एवं सेवानिवृत्‍त प्रोफसेर डॉ. भालेश्‍वर दुबे ने कहा कि के. आर भाई से सन् 1988 से घनिष्ठ पारिवारिक संबंध रहा हैं। एक उत्साही,नवाचारी और विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए वे सतत् प्रयत्नशील रहे। विज्ञान और शिक्षा पर अनवरत लिखने वाले कालूराम से अभी समाज को बहुत अपेक्षाएं थीं। उनकी एन बी टी से प्रकाश और जीवन पर पुस्तक का प्रकाशन होने वाला है। अपनत्व से लबरेज व्यक्तित्व जिसे मैं कभी भी नहीं भूल सकूंगा।

पर्यावरण विद एवं प्रोफेसर डॉ जयश्री सिक्‍का ने कहा कि वैज्ञानिक प्रयोगों और सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाने में उन्हें महारत हासिल थी।

वरिष्‍ठ सामाजिक कार्यकर्त्‍ता, लेखक एवं शिक्षा के क्षेत्र से संबध्‍द कुमार सिध्‍दार्थ ने अपनी भावपूर्ण श्रध्‍दांजलि व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि फाउंडेशन ने एक समर्पित, कर्मठ और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले साथी को खो दिया है। वे एक ऐसे मित्र थे, जो सबके प्रिय थे और स्‍वैच्छिक सेवा भाव की अनूठी मिसाल थे। सरल सौम्‍य, सादगी वाले केआर भाई का इस तरह विहार करना कि वे अब मिलेंगे ही नहीं। उनकी कमी पूरी हो नहीं सकती। वे सदैव हमारे हृदय में रहेंगे।

वरिष्‍ठ कवि आर तेलंग ने भावांजलि व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में जीवन लगा देने वाले के आर भाई की प्रकृति ठीक प्रकृति जैसी ही थी “जैसा है वैसा होना”, उसमें इस गुण का बीजारोपण अस्सी व नब्बे के दशक में होशंगाबाद जिले में हो रहे नवाचारी विज्ञान के दिनों में हुआ।

राग तेलंग ने कहा कि के आर को मैं एक सदाशयी और नेचुरल व्यक्तित्व के रूप में याद करता हूँ। उसने मुझे कई संगतों-बैठकों में अपनी जीवन यात्रा और उसके पड़ावों के बारे में तफसील से बताया था कि कैसे एक दुर्धर्ष संघर्षमय बचपन से निकलकर वह यहां तक आया। जब भी उसके विज्ञान आलेख बड़े-छोटे अखबार या पत्रिका में शाया होते मैं बातचीत में तारीफ जरूर करता। अब तो लगता है प्रकृति को जब भी निहारूंगा तो फूल, पत्ते, लताएं, परिंदे, तितलियाँ, कीट-पतंगे सबके सब अपने सालिम अली यानी के आर का पता पूछूंगे तो क्या कहूंगा ! एक चलते-फिरते स्कूल को न चाहकर भी अलविदा कहते गला भर आ रहा है ।

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