राष्ट्रीय डिजिटल हेल्थ मिशन की नीति को लागू करने के बजाए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना ज्यादा जरुरी

जन स्वास्थ्य अभियान ने हेल्थ डाटा मेनेजमेंट मसौदे पर दिये सुझाव

स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर देश में राष्ट्रीय डिजिटल हेल्थ मिशन की घोषणा करने के बाद सरकार ने हेल्थ डाटा मेनेजमेंट नीति का मसौदा तैयार कर जनता से एक सप्ताह में सुझाव मांगे गए थे, जिस पर मीडिया और विशेषज्ञों की आपत्ति के बाद सुझाव स्वीकार करने की तारीख को 21 सितम्बर तक बढ़ाया गया। जन स्वास्थ्य अभियान ने सरकार के इस मसौदे पर विस्तृत सुझाव प्रस्तुत किये हैं ।

जन स्वास्थ्य अभियान का अभिमत है कि सरकार द्वारा प्रस्तुत इस मसौदे में कई गंभीर खामियाँ हैं जिनके लागू होने के बाद व्यक्तिगत हेल्थ डाटा रखा जायेगा, सभी की एक नयी स्वास्थ्य पहचान संख्या (Health ID) बनाई जाएगी। एक तरफ उक्त नीति में कहा जा रहा है कि यह स्वास्थ्य पहचान संख्या स्वैच्छिक होगी परन्तु वहीं इस नीति के एक दूसरे दस्तावेज की रणनीति में कहा गया हैं कि सभी को स्वास्थ्य संख्या पहचान बनाना होगी। मतलब जिसकी स्वास्थ्य पहचान संख्या नहीं होगी उसको स्वास्थ्य सेवाएं का लाभ मिलना मुश्किल होगा।

इस नीति में यह भी कहा गया है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य डाटा किसी भी स्वास्थ्य सूचना तंत्र  उपयोगकर्ता (Health Information User) के साथ साझा किया जा सकता हैं, हालाँकि यह जानकारी साझा करने के लिए व्यक्ति की सहमति की बात कही जा रही हैं परन्तु इस जानकारी के गलत उपयोग किये जाने की पूरी सम्भावना है, जैसे अनैतिक दवा परीक्षण व अन्य मामलों में देखने को मिला हैं।

नीति का मसौदा फाइनल होने से पहले ही चंडीगढ़ में सरकारी अस्पताल और सभी सम्बन्धित स्वास्थ्य केन्द्रों में परिवार एवं सभी सदस्यों की पहचान संख्या बनाने की बात शुरू हो गयी हैं। एक बार यह पहचान संख्या बनाने के बाद व्यक्तिगत एवं स्वास्थ्य सम्बंधित जो जानकारी ली जाएगी वह जानकारी बाद में यदि कोई व्यक्ति/ मरीज स्वास्थ्य सूचना तंत्र से हटाना चाहता हैं तो उसके लिए सरकार ने कई सारी बंदिशे डाल दी है जो कि मरीज के अधिकारों का उल्लंघन हैं।

मरीजों की स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी का उपयोग स्वास्थ्य सूचना प्रदाता, जो गैर सरकारी कोई भी संस्थान हो सकता है और वह किसी भी उद्देश्य से मरीज का डाटा स्वास्थ्य सूचना उपयोगकर्ता (जो कि दवा कम्पनी या रिसर्च संस्थान अस्पताल हो सकते हैं) को दे सकते हैं। मरीज के डिजिटल सहमति लेने की बात तो कही गयी हैं परन्तु इसका भारत में विभिन्न सामाजिक – आर्थिक वर्ग, साक्षरता दर को देखते हुए इसके गलत उपयोग किये जाने की सम्भावना हैं।

जन स्वास्थ्य अभियान ने सरकार से मांग की है कि इस मिशन को लागू करने की बजाय सरकार कोविड– 19 के समय में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें, निजी स्वास्थ्य सेवाओं को रेग्युलेट करें तथा स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा एवं जनता की स्वास्थ्य की जरूरतों पर ध्यान दें । देश में पहले से ही सभी लोगों का एक यूनिक पहचान संख्या आधार हैं, जिसका उपयोग किया जा सकता है और इसके लिए भारी राशि का निवेश किया जा चुका हैं।

कोविड–19 की महामारी के दौर में पिछले 7 महीनों में यह सच्चाई सामने आ चुकी है कि अकेले सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इस महामारी से निपटने के लिए पूरी तरह से सक्षम नहीं है और उसे अनियंत्रित निजी स्वास्थ्य सेवा पर निर्भर रहना पड़ रहा है । ऐसे समय में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती के बजाए डिजिटल हेल्थ के लिए निवेश करना बहुराष्ट्रीय स्वास्थ्य उद्योग की मुनाफा कमाने की नीति का समर्थन करना हैं और उनको फायदा पहुँचाना हैं।

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